शंख एक पवित्र समुद्री वस्तु है जिसे हिंदू धर्म में अत्यंत शुभ माना जाता है। इसे भगवान विष्णु का प्रतीक माना जाता है और पूजा में इसका उपयोग वातावरण को शुद्ध करने के लिए किया जाता है। शंख की ध्वनि से नकारात्मक ऊर्जा दूर होने और सकारात्मक तरंगें बढ़ने की मान्यता है। यह स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है, क्योंकि शंख फूंकने से फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है। पूजा, आरती, और मंगल कार्यों की शुरुआत में शंख बजाया जाता है। शंख मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं—बाएँ घूमने वाला (वामावर्ती) और दाएँ घूमने वाला (दक्षिणावर्ती), जिनका अपना धार्मिक महत्व है।
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क्यों शंख बजाया जाता है?
शंख की ध्वनि को पवित्र माना गया है।
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यह वातावरण को शुद्ध और सकारात्मक बनाती है।
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माना जाता है कि शंख की ध्वनि से नकारात्मक ऊर्जाएँ दूर होती हैं।
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देवी–देवताओं का आवाहन करने में शंख का उपयोग किया जाता है।
क्या बिना शंख के पूजा अधूरी मानी जाती है?
अगर शंख उपलब्ध नहीं है, या कोई व्यक्ति स्वास्थ्य/शब्दसंवेदनशीलता की वजह से शंख नहीं बजा सकता, तो भी पूजा पूरी तरह स्वीकार्य है।
यदि आप चाहें तो बजाएँ, नहीं तो बिना शंख के भी पूजा पूरी और फलदायी होती है।

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