आरती क्यों और कैसे करें
आरती शब्द होता है - "आ समन्तात रति " इति आरति। लोक प्रचलन में आरती लिखा जाता है ,उदहारण - "आकूलात" किनारे तक. आगृहात घर तक. आ का अर्थ होता है आ +रति प्रारम्भ से अंत तक
रति प्रेम का नाम है आरति। सारी पूजाओं को जो देवता के लिए प्रेममय बना देती है वह आरति है।
तथा जिस कार्य से देव प्राप्ति हो वो आरति है।
पूर्ण समर्पण आरति के बाद होती है। पूजन प्रारम्भ से लेकर आरती तक की क्रिया फलदायी होती है।
शिव पुराण में एक कथा है की एक राजा पूजा कर रहे थे तभी मंत्रियों ने शत्रुओं द्वारा चढ़ाई की बात राजा को बताई तो राजा पूजा छोड़ आरति पूर्व गए तो राजा की हत्या हो गई।
आरति के बाद ही पूजा - यज्ञ समापन होता है। भिन्न -भिन्न देवताओं की अलग संख्या में आरति होती है'
आरती करने के पूर्व आप स्नान आदि से निवृत होकर साफ धुले हुए वस्त्र पहन कर ही आरती करें या उसमे सम्मिलित हों।
आरती के समय ये ध्यान अवश्य रखें की आपके पास सभी सामग्री उपलब्ध हो , जैसे - बाती ,घी ,फूल ,कपूर , इत्यादि प्रसाद भी अवश्य चढ़ाये। वो कुछ भी हो सकता है , मिष्टान ,बतासे , गुड़ ,मेवे इत्यादि।

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